महान् चमत्कारी श्री विशला स्तोत्रम्
प्रकट प्रभावी श्री माता विशाला गुणाष्टक
संपादन :
गच्छाधिपति आचार्य भगवंत
श्रीमद्विजय धर्मधुरंधर सूरीश्वर जी महाराज
॥ श्री विशला स्तोत्रम् ॥
त्वामेव चाम्बांगुणभूतिपूर्णम्,
त्वामेव चाद्यांशिवरूपलब्धाम् ।
त्यामेव कोचरकुलदेवीव्यातां
स्मरामि सततं विशला महार्हाम् ॥ १ ॥
अनन्तरूपां जिनधर्मसक्ताम्,
सच्छाक्तिरूपां परमप्रसन्नाम् ।
शुभाशुभकर्मफलदां वरेण्यां
स्मरामि सततं विशला महाम् ॥ २ ॥
सदासौम्यरूपां करुणाप्रधानां,
जगज्जीवधात्रीं दात्री सुखानि ।
पुण्यप्रकर्षा सद्गुणप्रहर्षा,
स्मरामि सततं विशलां महाहम् ॥ ३ ॥
महिषवाहिनी विशभुजां वन्दे सुशोभिताम् ।
अटलच्छत्रतिख्याता, करमीसरवासिनीम् ॥
माताजी की आराधनार्थ मनोवांछापूरक मन्त्र
ॐ ह्रीं श्री मम कुलदेवी विशला माता
सर्वकार्येषु सिद्धिं कुरु ॥
इस महान् चमत्कारी स्तोत्र का त्रिसन्ध्या स्मरण एवं
मंत्र-जाप करने से सभी मंगलों में मंगल की प्राप्ति होती है।
॥ श्री माता विशला गुणाष्टक ॥
पाया विबोध महिपाल गुरु कृपा से ।
आचार्य देव गुणसागर दुःखहर्ता ॥
ने दी विशेष शुभसूचक देशना है ।
से ली अपूर्व फिर सन्तति सौम्यरूप ॥ १ ॥
माता विशिष्ट धर रूप सविशेष चक्री ।
से नाम अंकन किया महिपाल राजा ।
सन्नाम कोचर किया जग में वरिष्ठ ।
विख्यात आज यह वंश विशला कृपा से ॥ २ ॥
संताप ताप हरने जनता विशेष ।
तो आ गई, उरझोजी के फिर संग माता ।
कल्याणकारक दयामय रूपशील ।
से आज दीपक यहाँ जगमग जगा है ॥ ३ ॥
कारुण्यपूर्ण घर भाव हमें सदा ही ।
देना ही माँ सुखद शान्ति सुरूप धर्म ।
बीसों भुजा सहित अस्त्र महिषीवाही ।
माथे किरीट कितना गुणरूप सोहे ॥ ४ ॥
मुक्ता गले अजब सौरभ रूपता ले ।
ले हाथ में खड्ग खप्पर दिव्य देवी ।
मोहे सदा जगत मानस को हे माते ।
नैर्मल्य भाव नित ही मन की अभीप्सा ॥ ५ ॥
तन्त्रादि में तु विशला महिषी सुतन्त्र ।
से उच्च तन्त्र न कहीं दिखता मनोज्ञ ।
श्री रामचन्द्र व ममोल विशेष में थे ।
संसिद्धि लब्ध करके सकतार्थ थे वे ॥ ६ ॥
आचार्य देव शुभदीप्ति विशिष्ट रूप ।
निर्माण कार्य हित धर्मधुरंधरा ।
पे माँ कृपा कृत किया सब कार्य हेतु ।
से आज सज्जित दिखे शुभ मन्दिरादि ॥ ७ ॥
श्रद्धा व भाव परिपूर्ण पढ़े गुणाष्टक ।
से हो मनोरथ अभीष्ट फलादिकारी ।
माता सदैव रखती उस पे सुदृष्टि ।
देती अपूर्व गुणदायक सिद्धि भव्य ॥ ८ ॥
फलश्रुति :
इस गुणाष्टक की २१ बार आराधना करने से
मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।