स्वर- रौनक कोचर , रचना- हम्मीरमल सुराणा औऱ सुनील पारख ( आनंद ), संगीत- फतह सुलेमानी मुम्बई, रिकॉडिंग - जय कमल ( यशु भादानी ), डायरेक्टर-सूट-एडीटर- अमरजीत सिंह गील, प्रोड्यूसर-वीरेन्द्र अभानी ( वीरू राजा )
अरिहंत सिद्ध साहु नमूं, धर गुरुवर का ध्यान।
नवदुर्गा की ज्योत है, विशाला शक्ति महान ॥1॥
स्वर्ग से सुन्दर वो धरा, माँ जहाँ ले विश्राम।
भव्यतम मन्दिर बना, करमीसर है धाम ॥2॥
जय-जय-जय हो विशला माता, भक्त चरण में शीश नवाता ॥3॥
करमीसर में मन्दिर प्यारा, चमक रहा बनकर उजियारा ॥4॥
नींव है इसकी बड़ी निराली, श्रद्धा-भाव की ईंट डाली ॥5॥
सर्वव्यापी हो सब दुःख नाशी, कर्म विनाशी घट-घटवासी ॥6॥
गाँव फलोदी से हो आई, उरझोजी पर कृपा सवाई ॥7॥
रूप कोचरी तुमने धारा, कोचर नाम दिया है प्यारा ॥8॥
कोचर वंश की बन अगुवाई, करमीसर में नींव लगाई ॥9॥
दौड़-दौड़ कर भक्त हैं आते, वरद हस्त आशीष पाते ॥10॥
जगमग कानन कुण्डल चमके, कोटि भानु सा तेज है दमके ॥11॥
बीस भुजा में अस्त्र हैं सोहे, मस्तक मुकुट अति मन मोहे ॥12॥
गल में मुक्ता माल सुहावे, हरख-हरख तेरे गुण गावे ॥13॥
महिष की तेरी है असवारी, चमचम चमके मूरत प्यारी ॥14॥
पोसलिया से आशीष पाई, महिपाल जी पुत्र को पाई ॥15॥
नाम जपे तेरा जो कोई, उस घर बहुविध मंगल होई ॥16॥
तेरी शक्ति अपरम्पारी, अंकुश डमरू की है धारी ॥17॥
तेरी महिमा अद्भुत जानी, आगम-निगम ने कथा बखानी ॥18॥
जो नित करता पाठ तुम्हारा, कभी न फिरता मारा-मारा ॥19॥
कल्पतरु सी तेरी छाया, अपरम्पार है तेरी माया ॥20॥
अंधन आँखियाँ ज्योत दिखावे, निर्धन को तू धन दिलावे ॥21॥
देश-देश में डंका बाजे, विशला माता के गुण गाजे ॥22॥
कंचन थाल कपूर की बाती, जगमग ज्योत जले दिन-राती ॥23॥
रक्त-शिखर पर ध्वजा लहराए, कीर्ति तेरी चहुँ ओर छाए ॥24॥
जब-जब तेरा ध्यान लगावे, भूत-प्रेत भय नहीं सतावे ॥25॥
नारियल मेवा भोग धरावे, सिर पर माँ के चंवर ढुलावे ॥26॥
नवरातों में लगता मेला, भक्त जनों का आता रेला ॥ 27 ॥
कोई पैदल चलकर आवे, कोई दण्डवत शीश नवावे ॥28॥
तन-मन-वचन से जो ध्यावे, नित माँ के दर्शन पावे ॥29॥
संकट मोचनकारी मैया, सबकी पार लगावे नैया ॥30॥
माँ विशला की कृपा हो जिन पर, चमके वो बनकर दिनकर ॥31॥
जिस घर में हो माँ का बासा, मन उसका न रहे उदासा ॥32॥
अन्न-धन-करुणा बरसाती, सारे संकट दूर भगाती ॥33॥
सौम्य-सौम्य दर्शन की दाती, सौम्य प्रभा चहुँ ओर फैलाती ॥34॥
करुणामयी माँ पूरी आशा, मातृ चरण के हम हैं दासा ॥35॥
करुणामयी माँ पूरी आशा, मातृ-चरण के हम हैं दासा ॥ 36 ॥
कश्मीसर में "धर्म-धुरन्धार" आये जीर्णोद्धारक बनकर ॥ 37 ॥
आनन्दमय हो 'प्रेम' गुण गाये, कहे 'हमीरम' मन की पाये ॥ 38 ॥
तुम कल्याणी तुम वरदानी, हम मूख है और खालकामी ॥ 39 ॥
गलती माफ हमारी करना, अपनी शरण में हमको रखना ॥40॥
दोहा
विशला माँ का चालीसा, पढ़े जो श्रद्धा धार।
दुःख-दरिद्र सब दूर हों, मिले सुख अपार ॥
विशला देवी मात का, धरी हृदय में ध्यान।
यश-कीर्ति जग में बढ़े, और मिले सम्मान ॥