कोचर गोत्र | माँ विशलामाता

कोचर गोत्र | माँ विशलामाता

कोचर गोत्र की कुलदेवी

माँ विशलामाता

शक्ति • परंपरा • आस्था

इस वीडियो में कोचर गोत्र की कुलदेवी माँ विशलामाता से जुड़ा संपूर्ण विवरण प्रस्तुत किया गया है। इसमें माँ विशला माता का इतिहास, कोचर वंश की परंपरा, चालीसा, स्तोत्र, पाठमाला एवं भजन आदि को वीडियो रूप में एक ही स्थान पर संकलित किया गया है। श्रद्धालुजन इस वीडियो के माध्यम से माँ के दर्शन, स्तुति एवं वंश परंपरा का भावपूर्ण अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।

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भूमिका : शक्ति और परंपरा

भारतीय संस्कृति, सभ्यता और आचार-व्यवहार में शक्ति तत्व सदैव प्रधान रहा है। कोचर गोत्र एवं कुलदेवी श्री विशलामाता की परंपरा भी इसी मनीषा शक्ति सिद्धांत पर आधारित मानी जाती है। माना जाता है कि देवताओं की निरंतर पराजय और हताशा ने एक ऐसी परमशक्ति की परिकल्पना को जन्म दिया, जिसमें विभिन्न देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियाँ देवी को अर्पित कीं। त्रिशूल, चक्र, शंख, अग्नि, वज्र, घंटा, दंड, धनुष, बाण, कमंडल, कमल, आभूषण, ग्रंथ आदि इन सभी प्रतीकों द्वारा देवी को महाशक्ति स्वरूप प्रदान किया गया। यह विवरण प्रतीकात्मक और दार्शनिक है।

कुलदेवी श्री विशलामाता

कोचर गोत्र की कुलदेवी श्री विशलामाता को मातृका एवं शक्ति स्वरूपा माना जाता है। पारंपरिक वर्णनों में उनका स्वरूप बीस भुजाओं वाला तथा भैंसे की सवारी पर विराजित बताया गया है। माँ विशलामाता को उग्र एवं सौम्य दोनों रूपों में पूजित किया जाता है। उग्र रूप में वे रक्षक हैं, और सौम्य रूप में करुणामयी एवं कल्याणकारी।

पूजा, प्रसाद एवं तिथियाँ

माता की पूजा-अर्चना में कई द्रव्यों का महत्व है। लापसी,पक्षाल, वर्क, कुंकुम, गुलाब के फूलों की पंखुड़ियाँ इत्यादि चढ़ाए जाते हैं। लेकिन दो वस्तुएँ माता को विशेष प्रिय हैं। अखंड फल होने के कारण माता के पूजन में श्रीफल (नारियल) अवश्य चढ़ाना चाहिए। सभी फलों में दाडिम (अनार) अत्यंत प्रिय है। साथ ही देवी को प्रिय हैं सोलह शृंगार। शृंगार समर्पित करने के बाद इत्र माता को अर्पित करना पूजा की पूर्णता का प्रतीक है। इत्र अर्पित करने के बाद माता को धूप, दीप और ज्योति अवश्य करनी चाहिए। नवरात्रा के दिनों में इनकी अराधना का विशेष आयोजन होता है । चैत्र मास में भी और अश्विन में भी साल में चार नवरात्री होती है । जिसमें दो गुप्त नवरात्री होते हैं। शक्ति की उपासना का पर्व शारदेय नवरात्री प्रतिपदा है नवमी तक निश्चित नौ तिथियां, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवद्या भक्ति अनंत काल से मनाया जाता है नौ का पहाडा संख्या की दृष्टि से अखण्ड बना रहता है। इसी भावना को केन्द्रित करते हुवे संवत 2010 में श्री विशला माता, पाठमाला, भजन, चौपाई, भारती आदि की रचना अनन्य उपासक श्री रामचन्द्र जी (भँवरसा) कोचर ने माता श्री के चरणों में समर्पित की और उसी काल खण्ड में माता अपने अनन्य उक्त उपासक को भक्ति उपासना स्वरूप अमूल्य अर अमोला श्री बीसा यंत्र (सर्वकार्य सिद्धि यंत्र) प्रदान किया । माँ सिद्धिदात्री है शक्तियों में उग्र व सौम्य दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दस महाविद्याऐं अनंत सिद्धियों प्रदान करने में समर्थ है। प्रत्येक वंश व कुल में परम्परा के अनुसार देवी देवताओं की मान्यता होती है कही यह मान्यता वंश के अनुसार तो कही भौगोलिक क्षेत्र विशेष के अनुसार इन्हें कुल देव या कुल देवी कहा जाता है। जन्म व विवाह के समय कुल देवी का विशेष पूजन किया जाता है । जिसे जात झडूला कहा जाता है । कुल देवी मां को बहुत करुणामयी दयालु व शीघ्र ही प्रसन्न होने वाली माना गया है।

आसोज सुदी नवमी, चैत्र सुदी अष्टमी, चैत्र एवं आश्विन नवरात्रों में विशेष आराधना की जाती है।

यह सामग्री पारंपरिक ग्रंथों, कुल अभिलेखों एवं मौखिक परंपराओं पर आधारित है। धार्मिक विवरण आस्था एवं प्रतीकात्मक मान्यताओं के अंतर्गत प्रस्तुत किए गए हैं।
भक्ति वास्तव में बड़ी शक्ति है। ज्ञान और योग मार्ग की अपेक्षा सरल भी है ज्ञान का संबंध मस्तिष्क और भक्ति का संबंध हृदय से है। भक्त के लिए अपने आराध्य देव /देवी । देवी सर्वत्र है उनके चरणों में समर्पित हो जाना ही सच्ची भक्ति है माता अपनी दाहिका शक्ति द्वारा भक्तों के शत्रुओं को परास्त कर व नष्ट कर उनकी रक्षा करती है। और आहादिका शक्ति द्वारा भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती है और उन्हें मंगल आशीर्वाद देती है। सुख सौभाग्य और समृद्धि में अभिवृद्धि करती है अपने प्रकाशिता शक्ति द्वारा संकट के समय मार्ग प्रदर्शित करती है अंधकार में पथ प्रशस्त करती है । साधना, सेवा व स्वाध्याय के त्रिवेणी का अनुसरण कर श्री विशलामाता के परम कृपा पात्र बन सकते है। " विशला समो न देवी, नवकार समो न पाठ । मोती समो न उजलो, चंदन समो न काठ । " जीवन स्वयं साधना हैं और सिद्धि की कुंजी है, जीना, जीने की कामना, जीने का लक्ष्य बनाये रखना तीनों येष्टाएं साधारण मनुष्य में अभिष्ट होती है । साधना का क्षेत्र दरूह है हर व्यक्ति आसानी से प्रवेश नहीं कर सकता है। मानसिक एकाग्रता और प्रतिकूलता में स्थिर रहने का दृढ संकल्प हो वही व्यक्ति साधना की ऊंचाई को पा सकता है। साधना में पूजन, मंत्र, यंत्र, तप, उपासना, योग, इष्ट, चिंतन, मनन का महत्वपूर्ण स्थान है हर मंत्र, यंत्र, तंत्र का व्यापक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित करता है । मंत्र साधना केवल ध्वनि पर आधारित है भले ही यह साधना मौन या मंद स्वर मे की जाती हो । यंत्र चित्रात्मक या देव प्रतिमा के प्रतिरूप में साधना पद्धति में स्वीकृत है यंत्र रचना करके मंत्र द्वारा पूजन करने पर यंत्र सिद्धि होती है यंत्र सिद्ध करने की पद्धति में प्राण प्रतिष्ठा करती है जिससे यंत्र प्रभावशाली होते हैं यत्र वर्णात्मक व संख्यात्मक रूप में भी बनाये जाते हैं । यंत्र में देवता की प्रतिष्ठा होती है मंत्र, यंत्र की साधना अत्यन्त कठिन साधना शैली होने के कारण तंत्र साधना का उदय हुआ । भौतिक पदार्थों के प्रति आकर्षक बढ़ने के कारण तंत्र साधना का प्रयोग होने लगा। शिव अर्थात् (कल्याण का भाव) और शक्ति का घनिष्ठ संबंध है दोनों एक दूसरे के पूरक है । मनुष्य केवल शरीर नहीं है उसमें मनन चिंतन व सर्जन व पुनःसर्जन की अद्‌भुत शक्ति है । यदि शक्ति उससे पार्थिकता से ऊपर उठा कर चिन्मयता की छोर ले जाती है। चिन्मयता की अनुभूति ही साधना का लक्ष्य है और उपासना का फल है जितनी भी साधना पद्धति उसमें शक्ति तत्व की केन्द्रीय भूमिका रहती है साधना यह शक्ति केन्द्र तत्व में जागृत मनुष्य होकर शिव से साक्षात्कार करता है है पर विभिन्न देवी देवताओं को महान कर सामर्थ्यवान बनता है भारतीय जीवन पद्धति देवीं के साथ देवियों को विशेष सम्मान व महत्व दिया है।

मंडोर : महिपाल जी और आचार्य पोसलियाजी

मंडोर निवासी महिपाल जी निःसंतान थे। इसी समय आचार्य पोसलियाजी का उनके यहाँ आगमन हुआ। महिपाल जी ने गुरुदेव से पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा।

आचार्य पोसलियाजी ने कहा कि यदि वे तपागच्छ साधु भगवंतों को गुरु स्वीकार करें, तो उपाय बताया जा सकता है। महिपाल जी ने इसे स्वीकार किया।

गुरुदेव ने निर्देश दिया कि अब से श्री विशलामाता को पशुबलि नहीं चढ़ाई जाएगी, आसोज सुदी नवमी एवं चैत्र सुदी अष्टमी को पूजन होगा। पूजन में सवा रुपया, नारियल और नैवेद्य चढ़ाना। काला एवं नीला वस्त्र नहीं पहनना। भैंस, बकरी और सांकल नहीं रखना। निछडिया में घूघरे नहीं डालना। चूड़ा नहीं पहनना, यदि पहनें तो अपने पीहर से पहनना। चरखा, झूला, झुनझुना नहीं रखना। स्त्री को पीला वस्त्र पहले पीहर का पहनना और फिर घर का। ये सभी बातें मानते हुए महिपाल ने पूजन किया। गुरुजी पोसलियाजी द्वारा बताए अनुसार पाँच महीने के गर्भाधान के समय माता की पूजा व रातिजोगा लगवाया।

इन सभी नियमों का पालन करने पर पुत्र प्राप्ति के समय कुलदेवी कोचरी रूप में बोलीं। इसी कारण पुत्र का नाम कोचर रखा गया। यहीं से कोचर वंश का नामकरण माना जाता है।

प्राचीन पृष्ठभूमि : ओसवाल, राजपूत और जैन परंपरा

प्रकृति की अनमोल कृति मानव है और भिन्न भिन्न आकृति स्वभाव में विभिन्नता पाई जाती है साथ में जातियों में कर्म के अनुसार भिन्नता मिलती है जैन धर्म के उत्तराधम्यन सूत्र में कहा है कि कर्मों यानि कार्य के अनुसार ही मनुष्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र बनता है किसी भी जाति में उत्पन्न हुए मनुष्य का महत्व उसके सद्‌गुण और कम से ही माना जाना चाहिये । जाति का संबंध जन्म से होता है परन्तु अपने धर्म जाति जन्म से न मानकर कर्म से मानी गयी है । यह सर्वविदित है कि को सवाल जाति के अधिकांश गौत्र राजपूतों से बने हैं सर्वप्रथम ओसिया नगरी में आचार्य श्रीरत्नप्रभसूरी के सपदेश से राजा उपलदेव उसके परिवारजनों ने जैन धर्म अंगीकार किया उसके बाद विभिन्न आचार्यों ने अलग अलग क्षेत्रों में विचरण कर इस जाति का विस्तार किया । धार नगरी

राजपूत पंवार से कोचर गोत्र बना जगदेववंशी शैवधर्मी डोडाजी पंवार सिरोही राजा के दीवान थे । संवत् 958 में हरिभदसूरी के उपदेशों से प्रभावित होकर जैन धर्म अंगीकार किया डोडाजी के पौत्र श्यामदेव व श्यामदेव के पुत्र रामदेव था । संवत् 1009 में भाचार्य नेमिचन्द्रसूरी के कहने से रामदेव जी सिरोही से पालनपुर गुजरात चले गये फिर पालनपुर से संवत् 1014 में पुगल आकर बस गये रामदेव जी की 21वीं पीढी में (बीकानेर कोचर कुल के आदि पुरुष) उरोजी हुए । वंश पहावली:- 1. रामदेवजी 2. हरदेवजी 3. धनदत्तजी 4. बाहडजी 5. भीमदेवजी 6. लाखनसीजी 7. जसबीरजी 8. मेघराजजी 9. श्रीचंदजी 10. पालणसिंहजी 11. मूलराजजी 12. देहऊजी 13. भीमडजी 14. चम्मडी 15. झाझडजी 16. महिपालजी 17. कोचरजी 18. भाणोजी 19. देवोजी 20. सिहोंजी 21. 32झोजी । इन्हीं रामदेवजी के वंशज संवत् 1385 में पुगल से मण्डोर आकर बस गये जिन्होंने मण्डौर में जैन मंदिर बनवाया जो आज भी स्थापित है इन्हीं की सोलहवीं पीढी में महिपाल जी हुए संवत् 1445 में मारवाड के शव चूडाजी ने राज्य का सारा कार्य महिपाल जी को सौंप दिया ।

आदि पुरुष श्री उरझोजी कोचर

रामदेवजी की 21वीं पीढ़ी में श्री उरझोजी कोचर उत्पन्न हुए, जिन्हें बीकानेर कोचर कुल का आदि पुरुष माना जाता है। उनका जन्म आषाढ़ शुक्ल तीज संवत् 1615 फलौदी में हुआ। उरझोजी जैसे पुत्र रत्न होते हैं जिन्होंने अपनी विनयशीलता, मिलनसारिता, नम्रता, सज्जनता, त्यागशीलता से सबको मुग्ध कर दिया। ऐसा अद्भुत व्यक्तित्व — उत्तुंग शिखर, मारवाड़ी पगड़ी, बलखाती सघन निर्दम मूछें, भव्य मुखाकृति, नयन, मोहक, सघन सूक्ष्म प्राणवान दृष्टि, कर्णरोम, सुंदर स्थूल नासिकाओष्ठ, वृषभस्कंध, भारी शरीर, सामान्य कद, बंदगले का लंबा कोट उस पर पड़ा आवर्तक, श्वेत उत्तरीय राजस्थानी विधि से परिधित धौत वस्त्र — यह बाह्य स्वरूप था उरझोजी का।

संवत् 1673 में बीकानेर के महाराजा सूरसिंह जी उन्हें बीकानेर ले आए और प्रशासनिक लेखन पद प्रदान किया।

फलौदी से बीकानेर प्रस्थान करते समय देवी मां विशला से आज्ञा मांगी | बीकानेर प्रस्थान के समय उरझोजी ने माँ विशलामाता से आज्ञा माँगी। तब माता ने कहा मैं भी तुम्हारे साथ बीकानेर चलूंगी परन्तु इस बात का ध्यान रखना रास्ते में रुकना नहीं, यदि रूकोगें तो वहीं स्थापित हो जाऊँगी।

भूलवश करमीसर में पड़ाव हुआ और माता वहीं स्थापित हो गईं। प्रारंभ में यह क्षेत्र अत्यंत दुर्गम था, परंतु माता की कृपा से मार्ग शीघ्र ही सुगम हो गया।

बीकानेर में आदि पुरुष उरझोजी की कीर्ति को चिरस्थायी बनाने के लिए मूर्ति स्थापना बल्लभ स्मारक कोचरों के चौक स्थित भवन में की गई, जहाँ आज भी कोचर परिवारों में वर-वधू फेरों के बाद पितामह को जात देने व आशीर्वाद प्राप्ति हेतु श्रीफल (नारियल) चढ़ाते हैं।

श्री उरझोजी का महाप्रयाण संवत 1684 को हुआ उनकी स्मृति में शहर के मध्य मार्ग गंगाशहर रोड पर उनकी चरणपादुकाएं स्थापित है जो आज भी अपने इतिहास की गवाह दे रहा है कोचर कुल का सुपुत्र इस नश्वर संसार से चला गया लेकिन इतनी सुगंध छोड गया कि आने वाली सैकड़ों पीढिया इनकी सुगन्ध से सुरभित होती रहेंगी । जीवन संयोग व वियोग एक ही रथ के दो पहिये है संयोग के साथ वियोग की महायात्रा जुडी है इस धरा पर कोई भी अजर अमर अवस्था को प्राप्त नहीं कर पाया इस संसार में जो भी व्यक्ति जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है यह शाश्वत सत्य है जिसको ना चाहते हुवे भी स्वीकार करना पडता है। लेकिन जो व्यक्ति अपनी जिंदगी में गुलाब के फूलों के समान महक चारों और बिखेरता और अपने संस्कारों से अन्य लोगों का पथ प्रदर्शित करता है सही मायने मे उसका जीवन सार्थकता को प्राप्त करता है और जीवन की प्रत्येक घटना किवदंती बन जाती है साथ ही संस्कृति का सोपान अभिन्न है अंग और बन जाता है संस्कृति जीवन विकास क्रम का प्रथम लक्ष्य ज्यों अंतिम लक्ष्य भी । पर असीम अनंत ऊंचाईयों का ज्यों वह पार करता है चढता जाता है द्वर उन्नत बनता जाता है उसका लक्ष्य और ऊँया एवं महान बनता जाता है। विकास के इस क्रम में उन्नति की कोई सीमा नहीं है मानवीय विकास का इतिहास, संस्कृति की प्रगति का एक स्वरूप है समय के गतिप्रवाह में जो उज्ज्वल उदांत और श्रेष्ठ उपलब्धि प्राप्त हो जाती है हम सुरक्षित रखना चाहते हैं वह हमारी धरोहर बन जाती है जीवन का प्रत्येक दिन एक इतिहास बन जाता है और हमारा परम कर्तव्य है जिस प्रकार हमारे पूर्वजों ने अपने महान् कार्यों से कुल का दीपक उज्ज्वल किया। उसी प्रकार हम भी उनकी कीर्तिकथाओं व महान् चरणों का अनुसरण करते हुए उनके गौरव को अक्षुण्य बनाये रखें और उरोजी के सुयोग्य सपूत कहलाएं साथ में उनके आशीर्वाद स्वरूप कोचर कुल में " प्रेम " व " स्नेह " और चेतना के भाव हमेशा जागृत रहे । यह निष्कंप दीप युग युगों तक इसी प्रकार प्रकाश देता रहे यही मंगलकामना ।

मंदिर निर्माण एवं प्रतिष्ठा इतिहास

शुभ घड़ी और शुभ वेला में शुभ हाथों द्वारा अर्पित बीज कामनीय कल्पवृक्ष बन जाता है। आचार्य भगवंत के प्रेरक उद्बोधन एवं अंतःस्पर्श वाणी के चमत्कारिक प्रभाव से श्री विशलामाता मंदिर के निर्माण कार्य का शुभारंभ हुआ।

श्री श्रुतभास्कर आचार्य धर्मधुरंधर सूरि जी के दिशा-निर्देशन में मंदिर निर्माण कार्य आरंभ हुआ। कोचर कुल के समस्त परिवारों ने तन-मन-धन से सहयोग प्रदान कर इस कार्य को चिरस्मरणीय बनाया।

करमीसर प्रांगण में दिनांक 18.02.2009 से 28.02.2009 तक दशाह्निक महोत्सव आयोजित हुआ। कुंभ स्थापना, दीप स्थापना, शोभा यात्रा, पंचकल्याणक पूजा एवं प्रतिष्ठा महोत्सव विधिवत् सम्पन्न हुआ। दशान्हिका महोत्सव की ऐतिहासिका में मां व गुरूजी की अनुपम कृपा दृष्टि का चमत्कार व आशीर्वाद के फलस्वरूप ही रहा। साथ में अपूर्व वात्सल्य के तले न तो किसी प्रकार की कमी महसूस हुई न ही कोई विघ्न हुआ । उक्त स्मृतियां जब हमारे मानस पटल पर उभरती है मन और मस्तिष्क पुलकित हो जाता है। उस समय प्रातः स्मरणीय मां का साकार स्वरूप प्रतिफलित हो उठता है धन्य है हमारी अनन्त अनन्त आस्था की पुंज आराध्य देवी जिसके नाम स्मरण में भी शक्ति है । साथ में गुरूजी के अनन्त अनन्त उपकारों की दीपशिखा हृदय मंदिर में सतत् जगमगाती रहे वही ज्योति हमारा संबल पाथेय है।

आचार्य भगवंत द्वारा श्री बीसा यंत्र (सर्वकार्य सिद्धि यंत्र) की प्राण-प्रतिष्ठा कर समस्त कोचर परिवारों को प्रदान किया गया।

उसी से कोचर कुल की जीवन सरिता में 'प्रेम' व 'स्नेह ' निरन्तर बढ़ता रहे

आज कोचर गोत्र की कुलदेवी माँ विशलामाता का गुंबदमय मंदिर अपने भव्य स्वरूप में युगों-युगों तक भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करता रहेगा।

कालक्रम (Timeline)

संवत् 958 -जैन धर्म अंगीकार किया डोडाजी के पौत्र श्यामदेव
संवत् 1009 — श्यामदेव के पुत्र रामदेवजी सिरोही से पालनपुर चले गये
संवत् 1014 — पुगल आकर बसे रामदेवजी
संवत् 1615 — श्री उरझोजी कोचर का जन्म
संवत् 1673 — बीकानेर आगमन, प्रशासनिक दायित्व
संवत् 1684 —श्री उरझोजी कोचर का स्वर्गवास (महाप्रयाण)
2009 — करमीसर मंदिर प्रतिष्ठा

वंशावली : उरझोजी के आठ पुत्र

श्री उरझोजी कोचर
रामसिंहजी
बीकानेर
भाखर सिंहजी
बीकानेर
रतनसिंहजी
बीकानेर
भीमसिंहजी
बीकानेर
राहूजी
फलोदी
डूंगरसिंहजी
जोधपुर
पंचायणासिंहजी
पाली / सोजत
राजसिंहजी
जालौर

इस वेबसाइट में प्रस्तुत ऐतिहासिक एवं धार्मिक सामग्री मुख्य रूप से निम्न ग्रंथ पर आधारित है:

प्रेम प्रकाश पुत्र रामचन्द्रजी (भंवरसा) कोचर

लेखक एवं संकलक के प्रति कोचर गोत्र की ओर से कृतज्ञता एवं आभार।

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पावन स्थल एवं धाम

कोचरो का चौक

बीकानेर

श्री विशलामाता मंदिर

करमीसर धाम

पूज्य श्री उरझोजी कोचर

समाधि स्थल, गंगाशहर रोड